एक नहीं,अपितु अनेक व्यक्तियों का बहुआयामी व्यक्तित्व एक ही परिसर में मिल जाए तो
आश्चर्यचकित होना स्वाभाविक है। किंतु जो शाश्वत है,उसे
झूठलाया नहीं जा सकता,क्योंकि वही आश्वस्त करता है। ग्यारह
दिवस तक आंखों देखा और महसूस हुआ जो मुझे प्रतीत हुआ,वही बयां कर रहा हूं।हुआ यूं कि 29 जनवरी 2022 को मेरी माता जी का पाइल्स का ऑपरेशन करवाने के लिए रजनीश हॉस्पिटल
शाहपुरा में हम अपराह्न के समय प्रवेश द्वार से प्रवेश किए तो गाड़ी के अंदर से ही
परिसर सुरम्य दिखा। वाकई में सुरम्य है भी। गाड़ी को पार्किंग में लगाकर जिस तरह
से पहली बार जाने के दौरान अन्य अस्पतालों में पूछताछ पर पूछताछ करते हैं ठीक उसी
तरह से हमने भी पूछताछ की। पूछताछ के पश्चात मैं अकेला ही डॉ.भारत शर्मा के कक्ष
में जैसे ही प्रवेश किया तो डॉक्टर साहब मंद-मंद मुस्कुराते हुए किसी मरीज को
परामर्श दे रहे थे और उनके समीप बैठी उनकी धर्मपत्नी समृद्धि शर्मा भी मुस्कान
बिखेरती हुई मरीज के परिजनों से वार्तालाप कर रही थी। दोनों के चेहरे के भाव देखकर
उस समय मैं तो भावविभोर हो गया। मेरी जगह आप भी होते तो शायद आप भी हो जाते,क्योंकि दोनों का बात करने का ढंग अलहदा हैं।
जब मैंने डॉक्टर साहब को अपनी माता जी के संदर्भ में बताया कि मेरी माता जी
को हॉस्पिटल के नाम से ही फोबिया है। उनको अस्पताल में घुटन सी महसूस होती है। ज्यादा दिन
रुक नहीं पाएगी,लेकिन ऑपरेशन कराना भी जरूरी है। मेरी बात
सुनकर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि कोई बात नहीं हम तीन दिन से ज्यादा नहीं
रखेंगे। आप माताजी को लेकर आइए। देख कर ही बता पाऊंगा। देखने
के पश्चात उन्होंने कहा कि ऑपरेशन करना पड़ेगा और अभी थोड़ी देर पश्चात ऑपरेशन कर
देते हैं। उसके बाद आपको परसों छुट्टी दे देंगे। लेकिन
उस रोज माताजी का ऑपरेशन नहीं हो सका, क्योंकि ऑपरेशन
आरजीएचएस के तहत होना था और साइट चल नहीं रही थी। जिसके चलते दूसरे दिन ऑपरेशन
होना तय हुआ। उस समय हम यही सोच रहे थे कि घर चलते हैं और सुबह आ जाएंगे। उस समय
मेरे मन में विचार आया कि क्यूं ना एक बार और डॉक्टर साहब से बात की जाए। दोबारा
मैं डॉक्टर साहब से बात करने गया तो उन्होंने कहा कि आप चाहें तो हॉस्पिटल में रह
सकते हैं। लेकिन उस रात हम किसी रिलेटिव के पास रुक गए और सुबह ठीक दस बजे
हॉस्पिटल में पहुंच गए। ग्यारह बजे डॉक्टर साहब आए तो
उन्होंने कहां कि आप एडमिट करवाइए।
एडमिट करवाने से लेकर और ऑपरेशन से पूर्व तक तकरीबन दस-बारह बार ऊपर-नीचे
आना-जाना हुआ होगा। क्योंकि माता जी को सेकंड फ्लोर पर एडमिट किया गया था। उस
दौरान जिस भी कार्मिक के पास गया तो उसका बोलचाल और समझाने का ढंग ऐसा था कि शब्दों
के जरिए बता पाना मुश्किल है। सब के सब स्थानीय भाषा में इस तरह से बातचीत करते
हैं,जैसे कोई अपना-अपनों से बात कर रहा हो। अस्पताल का प्रत्येक कर्मचारी अपनी
स्थानीय बोली से चुंबकीय आकर्षण की तरह अपनी और आकर्षित करने में मुझे तो अग्रणी
दिखे।
सहजता,सरलता और विनम्रतापूर्वक पेश आना उनका पेशा नहीं,बल्कि
संस्कार है। संस्कार कहां से आए और क्यूं आए,यह तो हॉस्पिटल
के प्रबंधक ही बता सकते हैं,पर मैं इतना जरूर कह सकता हूं कि
जिस तरह से खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है,ठीक उसी तरह
से यहां के कर्मचारियों का भी व्यवहार एक-दूसरे को देखकर परिवर्तित होता होगा। सच
पूछिए तो मुझे तो परिसर का कंकड़ भी दया और करुणा से सराबोर दिखा। जब माता जी को ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया तो मेरे मन में अनेक तरह के
ख्याल उमड़ने लगे। बेचैनी होने लगी। मन ही मन सोचने लगा कि कुछ गड़बड़ ना हो जाए। क्योंकि
माताजी की अवस्था को देखते हुए भयभीत होना स्वभाविक था,किंतु
मुझे अटूट विश्वास भी था कि ऑपरेशन में किसी तरह की कोई बाधा उत्पन्न नहीं होगी।
होती भी कैसे? जिस परिसर में स्नेह,वात्सल्य, प्रेम,सौहार्द
का वातावरण हो,वहां पर वेदना की परछाई भी कैसे आ सकती है। ऑपरेशन के पश्चात माता जी को वार्ड में लेकर आ रहे कर्मचारी के खिलखिलाते
चेहरे को देखकर एक पल के लिए तो मुझे ऐसा लगा कि ऑपरेशन थिएटर से लेकर आ रहा है या
फिर कहीं घुमा कर ले कर आया है। इतनी प्रसन्नता के साथ तो कोई अपना भी अपनों को
नहीं लेकर आता होगा।
उस समय गोधूलि का समय होने को आतुर था। वार्ड में विराजमान मरीज एवं उनके
परिजन खाना-खाने और बिस्तर लगाने में व्यस्त हो रहे थे और मैं यह सोच रहा था कि
ऑपरेशन तो हो गया है पर क्या माताजी रह पाएगी, लेकिन कुछ देर पश्चात आसपास के
बेड पर मौजूद मरीजों के साथ बातचीत करते हुए देखकर मुझे यह आश्वस्त हो गया था कि
माताजी को अब कोई तकलीफ शायद नहीं होगी। वार्ड में सब एक-दूसरे के साथ परिवार की
भांति सुख-दुख ही नहीं बांट रहे थे, बल्कि खाने-पीने की
वस्तु भी आदान-प्रदान कर रहे थे।वहां पर किसी को भी देख कर लग ही नहीं रहा था कि
अस्पताल के वार्ड में हैं,बल्कि ऐसे लग रहा था कि अपने घर पर
ही है। वार्ड में घर जैसा माहौल देखकर मुझे लगता नहीं कि कोई अपने घर वालों को याद
करता होगा।
दूसरे दिन सुबह जब मेरी आंखें खुली तो देखा कि चहुंओर कोहरा छाया हुआ है और
परिजन चाय की थड़ी से चाय ले जा रहे हैं,अपने मरीज व परिजनों के लिए। अस्पताल
के सफाई कर्मी ठिठुरती हुई सर्दी में भी पूरे इत्मीनान के साथ सफाई करने में लगे
हुए थे। उस रोज न जाने कितनी ही बार नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे आना-जाना हुआ। कभी
दवाई लेने तो कभी चाय पानी देने के लिए। इस
आने-जाने के दौरान ही मरीज एवं उनके परिजनों के मुंह से अस्पताल के डॉक्टर्स और
उनके कर्मचारियों की सराहना सुनी। मैंने तो किसी के मुंह से भी यह तक नहीं सुना कि
डॉक्टर साहब ऐसे हैं,वैसे हैं। सब के मुंह से यही सुना कि
यहां के डॉक्टर्स बहुत बढ़िया हैं। अच्छे हैं। सबसे अच्छे से बात करते हैं। यह सच
है कि व्यक्ति के मुश्किल समय में एक अच्छा डॉक्टर मिल जाए और वह प्यार व मानवता
की भावना से देखभाल करे तो व्यक्ति के लिए उससे अच्छा समय और क्या हो सकता है। सच
पूछिए तो डॉ.भारत शर्मा और डॉ.समृद्धि शर्मा धरा के भगवान हैं। इस दंपत्ति ने
सैकड़ों मरीजों की सांसो का संचार करके उन्हें जिंदगी ही नहीं दी बल्कि, उनके भरोसे को भी कायम रखा है।
तीसरा दिवस यानी कि नववर्ष का का दिन। जिसका सूर्यादय और अस्त हॉस्पिटल में
ही हुआ,हालांकि सूर्यास्त तो नहीं होता,क्योंकि माता जी को
दोपहर तीन बजे ही छुट्टी मिल गई थी,पर रामलाल गुर्जर जी ने
मुझसे कहा कि आप डॉ.भारत शर्मा से मिलकर ही जाना,डॉक्टर साहब
ऑपरेशन थिएटर में होने की वजह से सूर्यास्त हॉस्पिटल में ही हो गया था। छुट्टी मिलने से और डॉक्टर भारत शर्मा से मिलने के बीच में मैं माताजी के
पास जा रहा था कि एकाएक मेरी दृष्टि डॉ रजनीश शर्मा के कक्ष में बैठे व्यक्ति पर
पड़ी तो मैं उनके पास जाकर कहां की मुझे डॉक्टर साहब से मिलना है तो उन्होंने
तुरंत फोन किया और कहा कि आप आधे घंटे बाद ओटी के बाहर मिल लेना। उस समय हम दोनों
की तकरीबन दो या तीन मिनट वार्तालाप हुई होगी,जिसमें हम
दोनों ने एक-दूसरे का परिचय और मोबाइल नंबर आदान-प्रदान किए। उनके परिचय से व्यतीत
हुआ कि नाम वैभव शर्मा है, जो डॉ.भारत शर्मा जी के ही
अनुज भ्राता है।
सच पूछिए तो वैभव शर्मा जी का व्यक्तित्व तो विनम्रता के हिमालय,उदारता के सिंधु,सरलता के सागर,चुम्बकीय आकर्षण वाला व्यक्तित्व,व आमजन की पीड़ा से द्रवित हो उठने वाले एक आदर्श व्यक्तित्व के धनी निकले।
चेहरे पर मुस्कान और आंखों पर सपनों की सांझ,जिन्हें देखते
ही प्रतीत हुआ कि यही है हॉस्पिटल के चांद। ओटी के बाहर
तकरीबन डेढ़ घंटे खड़े रहने के पश्चात डॉक्टर साहब मुस्कुराते हुए आए और बोले कि
मुझे मालूम है कि आप काफी देर से खड़े हैं...। मैंने उनकी बात को काटते हुए कहा कि
कोई बात नहीं। इतना सुन कर एक बार वो फिर से मुस्कुराए और बोले कि ऑपरेशन अच्छी
तरह से हो गया है और पांच दिन बाद फिर से आना है। तीन दिवस में मैं और मेरे परिजन रजनीश हॉस्पिटल के डॉक्टर्स एवं स्टाफ से
इतने घुल मिल गए कि आभास ही नहीं हुआ कि घर पर है या हॉस्पिटल में हैं। मुझे रजनीश हॉस्पिटल के प्रत्येक कर्मचारी का व्यवहार एवं उनकी विनम्रता
बहुत ही प्रभावित की,लेकिन सचिन शर्मा और रामलाल गुर्जर जी
की व्यवहार वाकई में छोटे-बड़े भाई जैसा लगा।
छुट्टी मिलने के पश्चात फिर से माताजी को तकलीफ हुई हॉस्पिटल लेकर आए और इस
बार सात दिवस तक हॉस्पिटल में रहा इस दौरान नर्सिंग स्टाफ कन्हैया लाल चांदोलिया,लालाराम रैगर,
जितेंद्र चौधरी,बाबूलाल पायला सहित सभी की कार्यशैली बहुत ही सराहनीय हैं। यह सभी लोग मरीज एवं उनके परिजनों से इतनी
सहजता और सरलता से बात करते हैं कि पूछिए ही मत । बाई
जी संतरा देवी मुस्कुराती हुई इतनी अदब से वार्तालाप करती है कि जैसे कोई मेजबान
अपने मेहमान से करता है। बड़े बुजुर्गों से बड़े बुजुर्गों जैसी और बच्चों के साथ
बच्चों जैसी बातें करके उन्हें आभासी नहीं होने देती है कि आप अस्पताल में हैं या फिर घर पर हैं।
मेरे विचारों को पढ़कर किसी के मन में यह भी उत्पन्न हो सकता है कि यह सब
हॉस्पिटल वालों ने ही लिखवाया होगा,बल्कि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। मैं एक
राइटर हूं और राइटर के मन में जब विचार उत्पन्न होते हैं तो उन्हें लिखने के
पश्चात ही चैन मिलता है।
मोहनलाल मौर्य
पत्रकार एवं लेखक

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